डूबत नैया बैंक की , नेता पार लगई हैं रे ,
नई नई स्कीमें लाके ,ओव्हर लोड करई हैं रे ।
वोटन के ई राजनीति मा पहिलेन से सब चुसरे हैं ,
मुसबा बनके सलगे नेता, ओढ़नन तक का कुतरे हैं ।
जन धन की फूटी मटकी से ,पियासन मरा किसान रे,
दार पहुच गय दुई सो रुपिया ,घर नहीं कहौं पिसान रे ।
बँकन मा एन पी ए बढ़ी है कोउ नही देखईया रे ,
आँख मूँद बकलोल बने सब, शासन और नेतैया रे ।
बीस गुनी महगाई बाढी ,पाँच साल मा दइया रे ,
तऊ आयकर ओतनेन से ,है हमरे ब्लैक रुपैया रे ।
हुमच के भासन देहैं बाहर ,भीतर मुसबा लोटै रे ,
हम भूखे, झुरान ओंठ ,उईं दार भात सरपोटै रे ।
अबहूँ कहथे देश के नेता , नैया पार लगई हों रे ,
खुद चाहे डूबे हम भईया ,अच्छे दिन तऊ अइहैं रे ।