अपने कठिन परिश्रम से
अभावो में पोषित होकर
चला अकेला बनवासी l
प्रखर धनुर्धर कठिन राह में
खोज रहा खुद प्रतिभा को
श्रेष्ठ ज्ञान का अभिलाषी l
पंख कुतरकर बनवासी के
अर्जुन श्रेष्ठ बनाना था
आर्यों का वर्चस्व बढ़ाकर
गुरु श्रेष्ठ कहलाना था l
एकाधिकार हो प्रतिभा का
यह लगा बहुत अनिवार्य ,
अफ़सोस आज भी जिन्दा हैं
वे शातिर द्रोणाचार्य….l
माटी का पुतला प्रतीक,
गुरु की छबि का मान ,
स्वयं सिद्धि संकल्प लिए ,
ली धनु विद्या का ज्ञान l
पिघला शीशा मनु विद्या का
स्वयं आप में निखर गया ,
द्रोण श्वान का मुख रंजित हो
गुरु भीतर से बिफर गया l
कुटिल हुए स्वभावों के वे ,
कहलाते थे आर्य ,
अफ़सोस आज भी जिन्दा हैं
वे शातिर द्रोणाचार्य….l
गुरु की कुटिल सोच ने ,
ली निष्फल करने की ठान ,
गुरुदीक्षा में मांग लिया
अंगूठे का दान l
गुरु ने दीक्षा लेकर मानो
शिष्य को ऐसी सजा दिया ,
मृत माटी का पुतला ,
जीवित गुरुद्रोण को लजा दिया l
बिन कुछ कहे दान को देकर ,
प्रश्न बीज भी छोड़ दिया ,
दीक्षा का औचित्य हमारे ,
बौद्धिकता से जोड़ दिया l
बिन अँगूठा तीरंदाजी ,
परम्परा को मोड़ दिया ,
छीन नही पाया वो जो थी ,
प्रतिभा अस्वीकार्य l
अफ़सोस आज भी जिन्दा हैं
वे शातिर द्रोणाचार्य….l
पढ़े लिखे बौद्धिक समाज में ,
अपराधी भी पलते हैं ,
बलशाली शातिर होकर वे,
निर्बल को ही छलते हैं l
सीधे सादे बनवासी ,
काँटों की राह निकलते हैं ,
जंगल सा संघर्ष यहाँ है ,
मेहनतकश ही मिलते हैं l
लिप्त रहे निष्फल करने में,
बनवासी या दलित हुए हों.
उनके अच्छे कार्य ,
अफ़सोस आज भी जिन्दा हैं
वे शातिर द्रोणाचार्य……l