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खपरैल ..

खपरैले   माटी   के  घर  में
ढेर    टपकते   जल    तारे
गीले   बिस्तर  वस्त्रों के संग
जीवन     के    रंग    हमारे

झींगुर   मेढक   के  गीत सुने
मच्छर   के   हर   दंश   सहें
बीमारी   अब   कौन  शेष  है
दीन  हीन   की   कौन   कहे
 
घर आंगन की छोटी फटकी
आड़   बनी   है  अस्मत की
क्या जाने कब कौन लूट ले
पूँजी    मेरे   किस्मत    की

अन्धड़  और  तूफ़ान हमेशा
मुझे     सताते    रहते    हैं
अपनी   मौज  में  आने   पर
खपरैल    उड़ाते   रहते   हैं
 
भीतर का अन्धड़ रोक भी लूँ
बाहर  तो जीने  का सवाल है
अन्न  वस्त्र  घर  की चिंता में
सारा   जीवन  ही  बवाल  है

तपती   गर्मी    के   झोंके   से
मर   जाते   बच्चे   हर   साल
झुलस   रहा  परिवार  खुले में
मुश्किल, कितना रखूं ख़याल
 
ठिठुरन  की  जब  बारी  आई
छप्पर   की अलाव  बन आई
जगराता  हर   रोज  करें  हम
पेट  दबा   कर   सो जा भाई
 
कर्मठता  के  वो  बड़े  नगाड़े
स्वर  कानो   को   चुभते   हैं
मीठे  स्वर   के   तगड़े  वादे
दिये   तेल   बिन   बुझते   हैं
 
अंधेरों    में   हम  पले  पुसे   
अन्धकार    मय   जीवन  है
जब  अन्धेर   हुई  नगरी  है
चौपट   राज  दुखी  जन  हैं
 
अंधों   की  इस  नगरी   में
अहसासों  को खोज रहे  है
आइना बेच रहे उनको जो
 खुद को भी न देख रहे हैं 

तीखी त्योरियां

जलता रावण पूछ रहा