in

गंगा

धरा की हूं जीवन रेखा मैं ,

शिव मस्तक का श्रृंगार हूं ।

कहते मुझको पाप नाशिनी ,

नवजीवन का विस्तार हूं ।

अमृत कलश से छलकी,

मंथन की जल संचार हूं ।

भारत धरा की पावन गंगा ,

नदी नहीं , सुविचार हूं ।

जन मन की श्रद्धा में बसती ,

ऋषियों का संस्कार हूं ।

तीरथ का संसार है मुझमें ,

परम मोक्ष का द्वार हूं ।

धर्म के उन्मादों से जकड़ी ,

मां होकर लाचार हूं ।

अपनी व्यथा कहां मैं रोऊं ,

प्रदूषण का शिकार हूं ।

राजनीति के कीच में फंस,

अपमानित मैं हर बार हूं ।

आस लगाए निर्मल जल की ,

निरीह व्यथा की धार हूं ।

मेरे बेटे मगन कलह में ,

मैं अब बनी प्रचार हूं ।

मेरी दुर्गति की पीड़ा का ,

अंतिम एक गुहार हूं

पर्यावरण