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दिखावा ..

अब स्थिति यूँ है हमारी कि ..

लेटकर सोचते हैं _

कुछ करने के पहले

खूब ही सोचते हैं

इसी दौरान कोई

मुद्दे को हथिया कर

बाजी मार जाता है

कुछ कर गुजरने की सोच से

कलेजा मुह को आता है

काश्मीर का मुद्दा भी

ऐसा ही कुछ रहा

दुश्मन  हमारे घर घुसा

सर काटकर ले गया

हम देख लेने की,

पुंगी बजाते रहे

हर बार चकमा खा कर भी

दुश्मन हमें चिढाते रहे

एक बार हमने घुस कर

उन्हें क्या  मारा…

तबसे हमेशा छप्पन इंची

सीना दिखाते रहे

काश्मीर की बदहाली

याद  दिलाती है

बार-बार लूट सोमनाथ का

ज्यों धोबी का कुत्ता

घर का न घाट का

बढ़ती मह्गाइयों पर

पेट्रोल हम भराते और

ये मुस्कुराते रहे

सत्तर बरसों का रोना

कि पहले कुछ नहीं हुआ

फिर भी उस कुछ नही को बेचकर

खुशनुमा सपने दिखाते रहे

दर्द बयाँ करने पर

सुना जाते “ मन की बात “

औंधे मुख प्रजातंत्र

और जनता की भी

यही है “औकात ” l

राजनीति(बघेली )

ठहर जा …चुनाव है