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पर्यावरण

धरती की चीत्कार भयावह,

अगर न समझें आज।

आगामी पीढ़ी भुगतेगी,

विनाश काल का राज।

जल स्तर है निम्न निरंतर,

जन जीवन सब प्यासे हैं।

धरती अपने प्राण रोककर,

पाल रही हर साँसे हैं।

जंगल काट के खुश हो जाते,

गाते विकास के राग।

उद्योगों के धुएँ उगलते,

बीमारी  की  आग ।

काश, सड़क तट के तरुवर,

जो पथ विकास मे निबट गए।

उतने ही हम वृक्ष लगाते,

पथ के तट पर नये नये।

हरियाली, नदियों के कलरव,

छाँव वृक्ष यह प्राणवायु है।

कचरों का जंजाल, प्रदूषण

कम होती नित आज आयु है।

हर प्रजाति वन जीवन की है,

जूझ रही अपने पन को।

पर्यावरण की सोच अधूरी,

क्रान्ति चाहिए जन मन को।

सूखा,बाढ़,भूस्खलन का,

यदि  है कोई  विकल्प ।

आज सभी समवेत स्वरों से,

कर ले  यह  संकल्प।

जन्म, मरण या वैवाहिक,

जब स्मृतियों को दुहराएंगे।

कसम उन्हें है पुरखों की,

हर घर एक वृक्ष लगाएंगे।

अच्छे दिन अइहैं (बघेली)

गंगा