वो कहकर गया था कि -मै लौटूंगा माँ तब शादी करूँगा ,किन्तु आज पांच बरस हो गए वो लौटा ही नही बस … उसका पैसा समय से आ जाता है , उसे माँ की फिकर जो रहती है…सोचते हुए अचानक उसकी आँखों से आंसू की धारा बह निकलती है …मै कितनी स्वार्थी हूँ अपने बेटे से ज्यादा कहीं उसके भेजे हुए पैसे से खुश हो जाती हूँ… ऐसे मातृत्व पर धिक्कार है” और वहीं बैठ कर रोने लगती है l
महेश होनहार बेटा था बहुत संघर्ष करके अकेली माँ ने उसे पढा लिखा कर काबिल बना दिया अभी हाल ही में उसकी नौकरी उत्तराखंड राज्य में किसी सुरक्षा विभाग में लगने से शीघ्र उसे ज्वाइन करने जाना पड़ा l नौकरी अपने घर गाँव और माँ से काफी दूर जाकर मिली ज्वाइन करके वह खुश भी काफी था बस ..माँ नही थी वहां ..l घर खर्च के लिए माँ को हर माह पैसे बिला नागा भेज देता था l
मनीआर्डर लेकर आने वाला पोस्टमैंन हर माह माँ के पास आकर स्नेह की दो बातें करके उसका पैसा देता और चला जाता l अभी वह जाने को ही था कि माँ की सिसकी उसे सुनाई दी l पोस्टमैन ने माँ को रोता देख पूछ बैठा कि “आप क्यों रो रही हैं l” माँ ने बेटे के पांच बरसों से न आने के बारे में सारी मनो-व्यथा बिस्तार से बताया l पोस्टमैन ने सांत्वना देते हुए कहा – माँ जी आप धैर्य रखें आपका बेटा एक दिन जरूर आएगा… परन्तु पैसे तो हर माह की ठीक पहली तारीख को आ ही जाते हैं …l
यही तो दुःख देता है ,माँ हूँ न ..मुआ पैसा नही.. बेटा चाहिए मुझे…बेटे की आवाज सुनने तक को तरस गयी हूँ.. माँ ने रुआसी आवाज में कहा l
पोस्टमैन को जाते जाते विचार आया कि कैसा बेटा है .. जो इतने दिन हुए, आया ही नही अपनी बूढ़ी माँ को देखने, अलबत्ता पैसे तो समय पर ही भेजने में कोई कोर कसर नही रखता l
रोज के नियमित काम के बीच डाकघर के फोन की घंटी बजी ,पोस्टमैन ने रिसीवर उठाया “हेलो मैं उत्तराखंड से विकास बोल रहा हूँ ,क्या महेश की माँ को मनीआर्डर मिल गया … माँ कैसी हैं ..?
श्रीमान आप ही हैं जो हर माह उनका हाल चाल लेते हैं ,पर आपका क्या सम्बन्ध है माँ जी से … वे बहुत ही दुखी रहती हैं ,अपने बेटे की आवाज को सुनने को बड़ी बेचैन रहती हैं ,पर उनका बेटा उनसे बात ही नहीं करता इसी दुःख से उन्हें अक्सर रोते देखा करता हूँ l” पोस्टमैन ने कहा l
” मैं आपको नहीं बता सकता बस उनकी कुशलता की जानकारी बता दीजिये” …विकास ने कहा l
तभी पोस्टमैन ने उसी माँ की शपथ देते हुए कहा कि तनिक उसका हाल बताएं … मैं उन्हें क्या जबाब दूंगा ?
– माँ की शपथ का मान रखते हुए बताऊंगा ,पहले वायदा करो कि माँ जी को नही बताना है …l आज से पांच बरस हुए जब हमारे क्षेत्र में बाढ़ की भारी तबाही आई थी ,तब महेश मेरे साथ ही बचाव कार्य में ड्यूटी पर था ,बड़े ही उत्साह से उसने बहुतों को बचाया इसी दौरान उसके पैरों के बीच से संतुलन खोया और क्रूर लहरों ने उसे न जाने कितनी ही बार चट्टानों में टकराया होगा मेरा बहादुर मित्र जाते जाते माँ का ख्याल रखने की आवाज लगाई और जल मग्न होगया l तबसे आज भी मेरे कानों में उसकी आवाज जैसे गूँज रही है l हम सब उसे नहीं बचा सके … विकास ने रोते हुए कहा
विकास जी, यह बता दीजिये कि माँ जी को यह बात बताना क्यों नही है ,और पैसे आप ही क्यों भेजते हैं -पोस्टमैन ने पूछा l
महेश की माँ ने अपने जीवित अवस्था में बेटे को जी भरके देखा तक नहीं जो डाक से पैसे आते हैं उससे बेटे के होने का अहसास तो जिन्दा है ,इस अहसास को तोड़ने मुझमे हिम्मत नहीं है i माँ के भीतर उसके बेटे को जीवित रख कर ,खुद को मै भी जिन्दा रखना चाहता हूँ ,क्यों कि मेरी खुद की माँ के न रह जाने से मेरे जीवित रहने का अब कोई बहाना शेष नही रहा ,पहले भी अपनी माँ को पैसे भेजता था ,अब भी माँ को ही पैसे भेजता रहूँगा … जीवन में कभी अवश्य माँ के दर्शन करने आऊंगा ” कहकर विकास ने फोन कट कर दिया l
माँ आज भी डाकघर में जाकर फोन की घंटियों में बेटे का अहसास खोजती हुई इन्तजार करती रहती है और मनीआर्डर के पैसे आते ही बेटे के होने का आनंद उसकी रुंधे गले की आवाज और आंसू जिंदगी को ऊर्जान्वित करते रहते हैं l ——————————-