मरघट की ऊंची ऊंची लपटें
लाशें बनी जमात ,
राजा अपना काम छोड़कर
करता मन की बात l
गंगा के तट पर सब देंहें
रोतीं हैं दिन रात,
कूकुर कौवा बता रहे अब
जीवन की औकात l
इतने पर भी नही भरा मन
कफ़न खीच ली सबकी ,
सेटेलाईट अब पकड़ न पाए
चूक हमारे ” रब “की l
अकड़ी पडी अंगुलियाँ पूछें
क्या था उनका पाप ,
तेरे आंसू थे अभिनय,राजन
झूठा पश्चाताप l
काश तुम्हारी रैली ,मेला,
कुम्भ ,चुनाव न होते ,
हम सबकी दुर्गति न होती
अब भी जीवित होते l