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दंगा..

दंगों के रहबर तुम बोलो
लहू में क्या क्या दिखता है,
सदा तुम्हारी चर्चा हो
इतिहास तुम्ही को लिखता है l

धर्मान्धों की टोली लेकर
चाह रहे क्या करने को ,
क्या पोंछोगे आंसू सबके
या  छोड़ोगे   मरने   को  l

तुम्ही बता दो जोस जुनू में
कौन किसी का होता है ,
दंगों के अंगारों में  जल
हर साल किसी को खोता है l

कट्टे,बरछे ,भाले लेकर
जब दंगा  भीड़ भड़कता है ,
इसी बीच जो बना सहारा
होता  वही  फ़रिश्ता  है  l

जज-फरियादी  दोनों तुम हो
न्याय भाव तो डिगता है ,
संयम नही तुम्हारे रग में
नफरत भरी अधिकता है  l
 
घर पर जब तुतलाता बच्चा
पापा  बोल  बिलखता है ,
प्रश्न  पूछती  सूनी  मांगें
नई  कहानी  लिखता  है  l
 
घाव अभी भी जिन्दा  हैं
और लहू अनवरत रिसता है ,
दंगों की बलि चढी हमारे
मन का डर भी दिखता  है l
 
न  जाने  दंगों  के अंधे
कब तक दौड़  लगायेंगे ,
जिनके हाथों खेले उनको
कब तक सबक सिखायेंगे l

लाशों का दर्द

आक्सीजन बिन कोई मरा नहीं