| दंगों के रहबर तुम बोलो लहू में क्या क्या दिखता है, सदा तुम्हारी चर्चा हो इतिहास तुम्ही को लिखता है l धर्मान्धों की टोली लेकर चाह रहे क्या करने को , क्या पोंछोगे आंसू सबके या छोड़ोगे मरने को l तुम्ही बता दो जोस जुनू में कौन किसी का होता है , दंगों के अंगारों में जल हर साल किसी को खोता है l कट्टे,बरछे ,भाले लेकर जब दंगा भीड़ भड़कता है , इसी बीच जो बना सहारा होता वही फ़रिश्ता है l जज-फरियादी दोनों तुम हो न्याय भाव तो डिगता है , संयम नही तुम्हारे रग में नफरत भरी अधिकता है l घर पर जब तुतलाता बच्चा पापा बोल बिलखता है , प्रश्न पूछती सूनी मांगें नई कहानी लिखता है l घाव अभी भी जिन्दा हैं और लहू अनवरत रिसता है , दंगों की बलि चढी हमारे मन का डर भी दिखता है l न जाने दंगों के अंधे कब तक दौड़ लगायेंगे , जिनके हाथों खेले उनको कब तक सबक सिखायेंगे l |
in कविताएँ