in

मैं पत्थर मील का

मुझसे फिर भी, हो कौन,
लोग पूछते हैं।
आदमी के अलावा जाने,
क्या खोजते हैं।

मैं पत्थर हूँ मील का,
दूरियों से नहीं घबराता l
ठोकरों से पत्थर बना जबसे,
कोई टकराने नहीं आता l

सींग वाला आदमी भी,
सोचकर ही बोलता है।
जिल्लतों को कितना पिया,
जहर को तोलता है।

आज की सियासत मे यूँ तो,
एक बड़ी जागीर हूँ।
विष के घूँट पीकर अब,
मैं जहर बुझा तीर हूँ।

मेरी कलम मे,
सहस्त्र हाथियों सा बल है।
मिथक,छल के बगैर भी,
पैनापन प्रबल है।

टूटकर बिखरने के डर से,
कोई नहीं आता।
मैं पत्थर हूँ मील का,
दूरियों से नहीं घबराता।

मैने बहुत नीचे से घुसकर,
निकाले समुन्दर से मोतियाँ।
तय किये लम्बे रास्ते,
खाई हैँ सूखी रोटियाँ।

मुश्किलों को पार कर,
जोश के संग होश हूँ मैं।
प्रलयंकर का त्रिनेत्र बन,
महाकाल का रोष हूँ मैं।

बाल कविता

तीखी त्योरियां