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एक जोड़ी चप्पल

एक जोड़ी चप्पल

रोज सिलकर

खुशी की चाहत मे

उहापोह के साथ

जीता जिन्दगी

नंगे पैर तपती धूप मे

अधनंगा बदन

भूख मे अंतड़ियों का कसाव

नही पहनने देती

खुद का चप्पल l

अन्यथा धधकती

चिता सी जिंदगी

हर ऋतु मे अपने सवाल

ठण्ड की ठिठुरन

अलाव भरी रात,

प्याज,नमक,रोटी,

कंकड भरा भात

बरसात का भीगा घर

ढेरों टपकते छेद

घर गिरने को तैयार

घर का हर एक आदमी

अधमरा सा बीमार

फटी बिमाई,सूखेओठ संग

लेकर हर ऋतु से है

एक सवाल`

जाने कब दूर होगा

पैर का नंगा पन

होंगे बिछोने ,कपड़े घर

भातदाल और हो

घर खुशहाल…

हठयोगी..

असंगघोष..